Thursday, February 26, 2026

सवर्णों का अंतर्द्वंद्व

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हिंदू एकता के मामले में पक्ष और विपक्ष की पार्टियों में वही अंतर है जो कालनेमी और रावण में है। स्पष्ट है, रावण है तो ही कालनेमी है। इसमें समझने की बात यह है कि पिछले दो सौ सालों से सत्ता का चरित्र ही ऐसा हो गया है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी जनता को उत्पीड़क और उत्पीड़ित की काल्पनिक श्रेणियों में बांटकर सत्ता तक पहुंचने की अपनी राह को आसान करती है। सत्ता के इस चरित्र को समाप्त नहीं किया जा सकता है लेकिन इसके दुष्प्रभाव को कम अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए अपनी जायज मांगे मनवाने के लिए भी आपको साहेब, राहुल गाँधी या उनकी पार्टियों को अपना संघर्ष आउटसोर्स करने का लालच त्यागना पड़ेगा। 
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सामान्य श्रेणी के शहरी हिंदुओं ने समझ लिया है कि उनका काम वोट देना है बाकी का काम उनकी चहेती पार्टी और उसके नेता कर देंगे? ऐसा हुआ है क्या? मोदी या मोदी की भाजपा ने कौन सा ऐसा काम किया है जो सवर्णों के साथ हुए कानून पोषित अन्याय को कम किया है? उल्टे SC - ST अधिनियम को न्यायपूर्ण बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के २०१८ के फैसले को ही अतिमानव साहेब जी ने पलट दिया जिसके तहत आरोप ही प्रमाण है! आरोपी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई के लिए किसी प्रारंभिक जाँच की भी जरूरत नहीं है। 
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सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए कि मोदी को डर था कि आगामी २०१९ के लोकसभा चुनाव में SC - ST के लोग कहीं उनके खिलाफ एकजुट न हो जाए। यह डर क्यों पैदा हुआ? इसलिए कि खासकर SC के जातीय संगठन और उनको हवा देनेवाले सड़क पर उतर गए थे और राष्ट्रव्यापी उत्पात की धमकी देने लगे थे। उन्होंने अपनी गैर - वाजिब लड़ाई भी किसी को आउटसोर्स नहीं की है और न ही हिंदू एकता के नाम पर अपने हितों के साथ कोई समझौता किया है। यही रणनीति मजहबी, ईसाई और कम्युनिस्ट संगठन अपनाते हैं। 
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वोटबैंक की राजनीति हमेशा एक नकली उत्पीड़क और नकली पीड़ित की तलाश में रहती है। इससे राजनीतिज्ञों का काम तो आसान होता ही है, लोगों का ध्यान भी नेताओं की घटिया नीति और नीयत की ओर कम जाता है। यह बात अंग्रेजों से लेकर कांग्रेस और भाजपा शासन तक लागू है। फिर इसका इलाज क्या है? 
इसका इलाज है संगठित भीड़ बनकर अपनी अस्तित्व रक्षा के धर्म को निभाने के लिए सड़क पर उतरना। शाहीनबाग और आढ़तिया किसानों के आंदोलन इसके ताजा उदाहरण हैं। हालांकि ये आंदोलन न न्यायसम्मत थे और न ही नितिसम्मत लेकिन भीड़तंत्र के इस्तेमाल ने वोटबैंक केंद्रित लोकतंत्र को झुकाने में सफलता पाई। 
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उपरोक्त उदाहरणों से जाहिर है कि SC- ST अधिनियम से पहले से ही पीड़ित सामान्यवर्ग के हिंदू अगर अपनी न्यायपूर्ण मांग के लिए २०१८ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समर्थन में संगठित भीड़ बनकर सड़क पर उतरे होते तो मोदी सरकार २०२६ के यूजीसी दिशानिर्देश लाने की हिम्मत नहीं करती क्योंकि तब साहेब जी को लगता कि SC-ST वोट बैंक को साथ लाने के चक्कर में कहीं पहले से चट्टान की तरह साथ देनेवाला वोटबैंक खिसक न जाए। 
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इसी बात को कुछ और उदाहरणों से समझते हैं। हिंदू मंदिरों पर अंग्रेजों के समय से ही सरकारी नियंत्रण है। लेकिन चर्च, वक्फ , गुरुद्वारा आदि सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हैं। हिंदुओं के साथ लगभग दो सौ सालों से हो रहे इस जगजाहिर भेदभाव को सरकार संसद में बिना कोई कानून पास किए महज एक सरकारी ऑर्डर से खत्म कर सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ? क्यों नहीं हुआ? 
इसलिए नहीं हुआ कि उपरोक्त सरकारी नियंत्रण के विरुद्ध हिंदुओं की भीड़ सड़क पर नहीं उतरी। फिर प्रश्न उठता है कि हिन्दुत्व का दम भरनेवाली और हिंदू नवजागरण की लहर पर सवार होकर आई सरकार बिना किसी आंदोलन के भी तो ऐसा कर सकती थी पर किया नहीं क्योंकि उसे वोटबैंक के खिसकने कोई खतरा नहीं महसूस हुआ। 
दूसरी तरफ मंदिरों से यानी उनसे मिलने वाले हजारों करोड़ के दान से सरकारी नियंत्रण को खत्म करने से सत्ता संस्थान को नुकसान ही नुकसान है। अगर इन हजारों करोड़ों के हिंदूदान से सिर्फ हिंदुओं के लिए स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल और उद्योगतंत्र खड़े कर दिए गए तो सरकार पर हिंदू वोटबैंक की निर्भरता कम हो जाएगी। फिर सरकार से भ्रष्टाचार, लेट - लतीफी, अन्यायपूर्ण न्यायव्यवस्था आदि पर लोग सवाल पूछने लगेंगे। इसलिए सत्ता की राजनीति अपने वोटबैंक को पीड़ित और उत्पीड़क की नकली श्रेणियों में बांटने का आसान रास्ता चुनती है। 
मजे की बात यह है कि इसमें पक्ष - विपक्ष सब शामिल होते हैं बल्कि एक - दूसरे की मदद करते हैं। अभी ई. सन् २०२६ चल रहा है। २०१४ से अबतक केंद्र की मोदी सरकार भारत के पश्चिम बंगाल से सटे बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग का काम पूरा नहीं कर पाई है। तर्क दिया जाता है कि राज्य की ममता सरकार ने इसके लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराया। लेकिन केंद्र सरकार को अधिकार है कि वह राज्य सरकार को इस काम के लिए मजबूर कर सकती है। क्यों नहीं किया? क्योंकि ऐसा करने का कोई तात्कालिक दबाव नहीं है, कोई समूह इसके लिए संगठित भीड़ बनकर सड़क पर उतरने के लिए राजी नहीं है। लेकिन केंद्र सरकार के इस अनिर्णय से ममता बनर्जी का बांग्लादेशी घुसपैठियों वाला वोटबैंक प्रसन्न है। यह वोटबैंक अपनी अस्तित्व- रक्षा के लिए चौबीसों घंटे सड़क पर उतरने के लिए तैयार है। 
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इस बात को एक अन्य उदाहरण से भी समझा जा सकता है। ३६ सालों से लाखों कश्मीरी हिंदू अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी तो इस मामले को जोर - शोर से उठाती थी ( हालांकि घाटी से जब कश्मीरी हिंदुओं को सिर्फ हिंदू होने के कारण घाटी छोड़ने को मजबूर किया गया तो केंद्र में भाजपा समर्थित वी पी सिंह की सरकार थी जिसमें कश्मीर के ही मुफ्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे)। आज एक दशक से अधिक के भाजपा शासन में भी कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास नहीं हुआ है, क्यों? इसलिए कि कश्मीरी हिंदुओं की आबादी तीतर - बीतर हो गई है, वे संगठित भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी वाजिब मांग के लिए भी सड़क पर उतरने में सक्षम नहीं है और वोटबैंक वाली राजनीति को उनसे कोई खतरा नहीं है। ऐसे में कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास का मामले की हैसियत एक मुद्दा से अधिक नहीं है। दूसरी तरफ इसी बीच अपनी वोटबैंक वाली ताकत के कारण लगभग ५० हजार रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों जम्मू - कश्मीर राज्य में बसाये जा चुके हैं। 
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अंतिम बात। हिंदुओं की एकता और अस्तित्व का आधार जाति रही है। सामान्य श्रेणी के हिंदुओं की वर्तमान विकट स्थिति का आधार भी जाति ही है। संविधान भी जाति को मजहब या धर्म से कहीं अधिक मान्यता देता है। ऐसे में यह इसी श्रेणी के लोगों के ऊपर निर्भर है कि वे अपनी अस्तित्व- रक्षा के लिए जाति का किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। कोई दूसरा यह काम उनके लिए नहीं करेगा। दूसरा सिर्फ और सिर्फ उनको उत्पीड़क घोषित करने का नकली नैरेटिव गढ़ने में जमीन - आसमान एक कर देगा। हां, अस्तित्व-रक्षा के लिए एक संगठित भीड़ के रूप में सड़क पर उतरना सामान्य श्रेणी के लोगों का राष्ट्रीय धर्म है जिससे विमुख होना शुद्ध रूप से अधार्मिक और कायरता है। 
© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

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