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Was born in Roopnarayanpur village, Bihar; got my early education in village schools till I was 12; later moved to Zila School Muzaffarpur, after I got Rural National Merit Scholarship; did my intermediate (+) from Bihar College of Engineering, Patna; Graduation (Econnmics Hons.) from Ramjas College, Delhi University; MA(Hindi),M.Phil( Sociology of Literature), Ph.D(Journ.) from JNU; M.Sc.- Media Management(SMU), PG Intensive Course in Journalism(TOI), Advanced Training in Business Journalism, Singapore. Publications include Before The Headlines--A handbook of TV journalism( MACMILLAN), Dictionary of Media & Journalism, Discovery Channel Stylebook(Member, Core Team), and, News on the Web News for the Web in MAKING NEWS(ed.), OXFORD UNIVERSITY PRESS. My passion: teaching journalism and lecturing on media related issues Note: My comments are personal and professional, not official.

Monday, March 19, 2018

कवि केदारनाथ सिंह को श्रद्धाँजलि


"तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह ?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?"
.
1989-90 की बात होगी। जेएनयू के भारतीय भाषा विभाग में यह तय करने के लिए प्रोफेसरों की मीटिंग हो रही थी कि किसके पीएचडी गाइड कौन होंगे। जिस कमरे में मीटिंग हो रही थी उसके बाहर मैं प्रोफेसर केदारनाथ सिंह की प्रतीक्षा कर रहा था क्योंकि वे अबतक नहीं पहुंचे थे। उन्हें देखते ही मैंने उनके चरण-स्पर्श करते हुए कहा: सर, मुझे अपने अंदर पीएचडी के लिए ले लीजियेगा, नहीं तो यह रहा मेरा घर वापसी का टिकट और वो रही मेरी बेडिंग।
केदार जी छुटते ही बोले: बेवकूफ कहीं के! 18 लोग मेरे अंदर काम कर रहे हैं, सबका नाम भी याद नहीं। कैसे तुम्हें अपने साथ (पीएचडी के लिए) ले पाऊँगा।
शाम को लिस्ट निकली तो मेरा नाम उन दो लोगों में था जिनके लिए केदार जी ने हामी भरी थी। लेकिन यह जानकारी तो मुझे ब्रह्मपुत्र हॉस्टल के मेस में उनलोगों से मिली जो केदार जी के साथ काम करना चाहते थे लेकिन मेरे सौभाग्य से वे वंचित रह गए थे। इनमें से एक ने ईर्ष्यावश तंज करते हुए कहा था: सर के साथ तो कोई शोधछात्र इस बार है नहीं, दोनों ही छात्राएँ हैं। मैंने कहा, सब कह रहे हैं मैं भी उनके साथ हूँ। फिर उसने कहा: ठीक तो है, तुम भी तो 'चंद्रकांता' ही हो। उन दिनों दूरदर्शन पर प्रसारित "चंद्रकांता संतति" सीरियल का बड़ा ज़ोर था।
वैसे ही एक वाक़या मेरी पीएचडी के टॉपिक का है। मैं 1857 के ग़दर के दौरान लोकगीतों की भूमिका पर काम करना चाह रहा था। वे बोले, यह काफ़ी समय लेनेवाला विषय है, कोई ग्रुप इस पर काम करे तो अच्छा। तुम बिहारी हो, शिवपूजन सहाय भी एक आकाशधर्मी बिहारी  संपादक-पत्रकार थे। उनपर काम नहीं हुआ है, तुम उनकी साहित्यिक पत्रकारिता पर काम करो। इसके पहले एमफिल में वे मुझसे शिवपूजन सहाय के ही उपन्यास पर काम करवा चुके थे, टॉपिक था,'देहाती दुनिया का समाजशास्त्रीय अध्ययन'।
अक्सर लोग कहते थे कि केदार जी शोध में सख़्ती नहीं करते, इसलिए उनके साथ पीएचडी करनेवालों की लंबी लाइन रहती है। मेरा अनुभव उलट था। उन्होंने मुझसे आधा दर्जन बार सिनोप्सिस लिखवायी फिर जाकर उसे पास किया। आज जब 24 साल बाद उस थीसिस को देखता हूँ तो लगता है उसमें से वे झाँकते हुए से कह रहे हों: अगर तुमसे इस टॉपिक पर काम नहीं करवाया होता तो मेरी श्रद्धाँजलि तुम इस तरह लिख पाते!
सर, असल बात यह है कि अगर आपने मुझसे इस टॉपिक पर काम नहीं करवाया होता तो मैं चाहे और जो बन जाता, पत्रकारिता और जनसंचार का यूनिवर्सिटी प्रोफेसर तो नहीं ही बन पाता।
कवि केदारनाथ सिंह सामनेवाले को अपने अध्ययन-चिंतन की गुरुता का अहसास नहीं होने देते थे। बिल्कुल पानी की तरह किसी के भी साथ घुलमिल जाते थे। वे ऐसे शिक्षक थे जिनकी क्लास से बाहर निकलते हुए लगता था मानों पढ़ाये गए विषय पर कितना जानना बाक़ी है, और तो और उस विषय पर  कितना शोध होना बाक़ी है। उनकी हर क्लास में कम-से-कम 4 पीएचडी टॉपिक ज़रूर निकल सकते थे।
पाश्चात्य साहित्य, ख़ासकर अमेरिकी कविता पर उनकी गहरी पकड़ थी। वाल्ट व्हिटमैन उनके प्रिय कवियों में थे, विशेषकर अपनी छंदमुक्त कविताओं के लिए। कविता के अर्थ को सिर्फ उसे पढ़ने की शैली से परत दर परत कैसे खोला जाता है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी। उनसे निराला की तीन कविताएँ पढ़ने का सौभाग्य मिला था---'वह तोड़ती पत्थर', 'सरोज स्मृति' और 'राम की शक्ति-पूजा'। लगता था मानों निराला की संवेदनशीलता केदार जी द्वारा कवितापाठ से मूर्तिमान हो रही हो। इसके बाद हमें कविता पढ़ना आ गया।
जिस युग की वे ऊपज थे, वह सोवियत क्रान्ति के बाद साम्यवादी विचारधारा के दबदबे का दौर था।लेकिन कोई भी विचारधारा उनके साथ दबंगई नहीं कर सकती थी क्योंकि उनके संवेदना-मंच पर हमेशा न जाने कितनी सौंदर्य-दृष्टियाँ अठखेलियाँ कर रही होती थीं। तभी सोवियत संघ के विघटन के बाद जब विचारधारा-ग्रस्त साहित्यकारों में श्मशान सी मुर्दनी छा गई थी, वे एक यूरोपीय कवि को याद करते हुए कह सके थे:
"विचारधाराएँ सारी मुरझा गईं हैं/
जीवनवृक्ष निरंतर हरा है"।
साल 1993, पटना की बात है। लालू प्रसाद का मसीहाई करिश्मा अपने चरम पर था। केदार जी को 'दिनकर सम्मान' मिला था। सम्भव है इसमें बिहार के जानेमाने साहित्यकार और रेणु साहित्य के मर्मज्ञ डॉ रामवचन राय की भूमिका रही हो। बहरहाल मंच पर जब पुरस्कार ग्रहण करने की बारी आई तो उन्होंने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के हाथ मिलाने की पहल का जवाब 'दूर से नमस्कार' करके ही दिया था। ऐसी भी सख़्त हो सकती थी कवि केदारनाथ सिंह की कोमलता। इसके पहले ही उनसे बातचीत में मुझे इस बात का आभास हो गया था कि बिहार में आर्थिक विकास ठप सा हो जाने से वे दुःखी थे।
बिहार से उन्हें ख़ास लगाव था। छपरा जिले (शायद मशरक थाना) के एक गाँव में उनका ननिहाल था। बड़े गर्वभाव से कहते थे: मैं भी आधा बिहारी हूँ। मेरे नाम से यहाँ अभी भी ज़मीन है। सम्भव है बिहार के प्रति इसी लगाव ने उन्हें अपने एकमात्र पुत्र सुनील कुमार सिंह की शादी पटना के एक परिवार में करने के लिए प्रेरित किया हो। अपनी दो पुत्रियों का विवाह भी उन्होंने बिहार में किया था।
वे जब भी बिहार आते, कोई न कोई साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत की 'ख़बर' जैसी चीज़ उनके पास होती थी। एक बार कहने लगे: ईरान से बाहर फ़ारसी का दूसरा सबसे बड़ा कवि एक बिहारी था। उनका नाम था,'बेदिल अज़ीमाबादी ' जिन्होंने रोज़ी-रोटी की तलाश में पटना छोड़ते हुए कहा था:
"पटना नगरी छार दिहिन
अब बेदिल चले बिदेस"।
मैंने पूछा था: सर, ईरान से बाहर फ़ारसी के सबसे बड़े कवि कौन हैं? उनका जवाब था, अमीर ख़ुसरो।
आधिकारिक तौर पर तो उनका जन्मवर्ष 1934 है लेकिन असल में वे नवम्बर 1932 में पैदा हुए थे। पहले गाँव के स्कूल के प्रधानाध्यापक अपने अंदाज़ से छात्र-छात्राओं के जन्मदिन लिख देते थे। इस लिहाज से केदार जी 85 साल 4 महीने के होकर गए हैं। लेकिन ऐसे लोग जाते-जाते वक़्त की रेत पर न जाने कितने रूपों में कौन-कौन से निशान छोड़ जाते हैं, यह तो ख़ुदा जाने।
अगर कोई मुझसे यह पूछे कि तुम अपने प्रोफेसर के बारे में 2-3 लाइनों में कुछ ऐसा कहो जो उनको मूर्तिमान कर दे, तो मैं कहूँगा कि 'अगर शिशु-सुलभ जिज्ञासा और कौतुहल से लबरेज़ कोई बुजुर्ग दिखें तो समझना वे कोई और नहीं, कवि केदारनाथ सिंह ही हैं'। आकस्मिक नहीं है कि जब गोरखपुर में पडरौना-स्थित एक कॉलेज में वे प्राचार्य थे तो एक विवाद को सुलझाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने उन्हें ही अपना पंच माना था। यही अंतर था उनमें और अल्लामा इक़बाल में जो एक तरफ़ लिखते हैं,'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' तो दूसरी तरफ़ दिलों में 'पाकिस्तान' की नींव भी रखते चले:
हो जाए ग़र शाहे ख़ुरासान का इशारा
सज़दा न करूँ हिंद की नापाक ज़मीन पर।
इसके बरअक्स केदार जी की 1983 में लिखी कविता 'सन् 47 को याद करते हुए' की ये पंक्तियाँ तो देखिये:
"तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेचकर
सबसे अखीर में लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?
"तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हें याद है शुरू से अखीर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़-घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गये थे नूर मियाँ?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं
पाकिस्तान में?
"तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह ?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?"
©चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह
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नोट: कवि केदारनाथ सिंह को 2013 के ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर मेरे लिखे आलेख का लिंक:

Sunday, December 31, 2017

Hindu Diaspora promoting an anti-minority regime in India ?


25.12.17
Some people say that the Hindu Diaspora, a minority itself globally, is promoting an anti-minority regime in India.
My take on this is as following:
1. This statement is NAARATIVE-led, not DATA-led as it conveniently leaves out the phenomenon of Majority suffering from the Minority Syndrome because of Minoritism being promoted by the votebank politics that equated Muslim Fundamentalism and its Appeasement with Secularism.
2. Another important point left out by this statement is the phenomenon of Islamic Terrorism globally.
3. The third point is the faulty conceptualization of Minority itself. In India, Muslims with 16 plus population are treated as a minority whereas they are a second largest majority whose mindset was best summed up by Akbar Ilahabadi almost a century ago:
पेट मसरूफ़ है क्लर्की में
दिल है ईरान और टर्की में।
4. And this so called minority is hellbent upon forcing the wheel of time back through its insistence on Anti-human and Discriminatory Special Privileges as per Shari'a. Globally, non-Muslim minorities fight for equality not for privileges such as Triple Talaq.
5. The most important point conveniently overlooked is the fact that the weakest minority is none other than the INDIVIDUAL for whom the 'Muslim Minority' has least respect as it wants to relive the age that believed in the affluence resulting from Maal-e-Ghanimat.

Summing up, such a narrative is beautifully structured to pick up data that suit to its pre-decided conclusions rather than allowing the narrative flow from the data. This is typically a SECULAR-LIBERAL trait badly challenged by the data-miners!
Consequently, this narrative miserably fails to articulate the fact that Hindu NRIs are responding to the same challenges in their adopted countries as Hindus do back in India or non-Muslims globally. And what are the challenges? These are about how best to counter an anti-human political ideology (Islam) that is using democratic freedoms to kill the democracy itself in the longterm.
©Chandrakant P Singh

हिंसा ही परम धर्म है... हिंसा से ही टिकाऊ शांति सम्भव है...

25.12.17
हिंसा ही परम धर्म है...
हिंसा से ही टिकाऊ शांति सम्भव है...

1000 सालों से धोखे-नरसंहार-लूट-अपमान के शिकार हिंदुओं को सिर्फ सात्विक हिंसा ही बचा सकती है क्योंकि अबतक अहिंसा को कायरता की हद तक महिमामंडित किया गया है।
इस सात्विक हिंसा का ही हिस्सा है सवाल पूछना...
उन घटनाओं-लोगों-स्थानों-प्रतीकों-अवधारणाओं-परिभाषाओं पर सवाल उठाना जिनके दम पर हर ग़लत चीज़ को सही साबित करने की साज़िश होती रही है...

●राम का जन्म प्रमाणपत्र माँगनेवालों के उत्सव में हम क्यों शरीक़ हों जबतक वे उनके जन्म के प्रमाणपत्र नहीं दे देते जिनका उत्सव मना रहे हैं?
●हिंदुओं के तीनों देवताओं-नायकों के जन्मस्थानों पर मस्जिदें क्यों हैं? ये मस्जिदवाले पहले आये या हमारे देवता और नायक?
●नालंदा विश्वविद्यालय को जलानेवाले के नाम पर आज भी बिहार के एक शहर (बख़्तियारपुर) का नाम क्यों है?
●भारत को दीन-हीन बनानेवाले अंग्रेज़ों की रानी के नाम पर 'विक्टोरिया मेमोरियल' क्यों है?
●हमारे प्रतीकों को अपमानित करनेवालों के उत्सव में शामिल होने की मूर्खता हम क्यों करें?
●ये सेकुलर-कम्युनल क्या बला है? इसकी उम्र क्या है? इसके पैदा होने के पहले ही भारत ने ईसाइयों के मारे यहूदियों, मुसलमानों के मारे पारसियों और एक ख़लीफ़ा के मारे पैग़म्बर मुहम्मद के परिवार को किस आधार पर ससम्मान शरण दी थी?
●हम उस गंगा-जमुनी तहजीब को क्यों मानें जो फरेब पर टिकी है, जो हमें 'प्रयाग' को 'अल्लाहाबाद'(इलाहाबाद), 'अयोध्या' को 'फैज़ाबाद', आगरा' को 'अकबराबाद', 'पटना' को 'अजीमाबाद' और 'रामसेतु' को 'एडम्स ब्रिज' कहने को मजबूर करती है?
●हम उस सांस्कृतिक समरसता को क्यों मानें जो हमारे अंदर 'स्वामीभाव' की जगह 'दास्यभाव' को मजबूत करती है, जो कबीर-रहीम-रसखान-मीर-ग़ालिब-नज़ीर की जगह हाली-इक़बाल को इस्लाम के बौद्धिक शमशीर के रूप में स्थापित करती है?
●दिल्ली में लोदी रोड की जगह कबीर रोड क्यों नहीं है?
●बाबर रोड की जगह राणा सांगा रोड क्यों नहीं है?
●अकबर रोड की जगह राणा प्रताप रोड क्यों नहीं है?
●फिर हम ऐसे व्यक्ति को अपना नायक क्यों माने जो गर्व से कहता था: 'मैं तो मन से यूरोपीय हूँ और सिर्फ तन से भारतीय' ? भले ही वह व्यक्ति देश का पहला प्रधानमंत्री क्यों न हो?
●हमारे नायक हम तय करेंगे कि हमारे दुश्मन? आज़ादी 70 सालों बाद भी हमारे दिलोदिमाग पर हमारे दुश्मन क्यों हावी हैं?
●हम इन दुश्मन-विचारों की चीरफाड़ क्यों नहीं करते?
●उच्चशिक्षा प्राप्त भारतीयों के हिन्दू-द्वेषी, देशहित-विरोधी और मानसिक ग़ुलाम होने का ख़तरा क्यों रहता है?
●अक्सर विज्ञान के विद्यार्थी राष्ट्रवादी और समाजविज्ञानों-साहित्य के विद्यार्थी राष्ट्रद्वेषी क्यों हो जाते हैं?
●गाँव की एक अनपढ़ बुजुर्ग महिला क्यों कहती है:
'जे जेतना पढ़ुआ उ ओतना भड़ुआ' ?

आज जो हमारे सवालों से बिलबिलाये हैं वे हमें नेस्तनाबूद करनेवालों को अपने नायक मानते हैं जो एक बौद्धिक हिंसा है। हमारे सवाल फिलहाल तो बौद्धिक प्रतिहिंसा या आत्मरक्षार्थ ही हैं लेकिन कल को इन्हें और भेदक और लेज़र-धर्मी होना पड़ेगा।
लब्बोलुआब यह है कि हिंसा और हिंसा ही टिकाऊ अहिंसा और शांति की गारंटी है न कि बौद्धिक-कायरता जनित अहिंसा।
©चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

ईसा मसीह पर भारत का दावा किसी से भी कहीं ज़्यादा है


25.12.17
ईसा मसीह पर भारत का दावा किसी से भी कहीं ज़्यादा है

ईसाई वह जो माने कि ईसा मसीह क्रॉस पर लटकाने से मरे थे और दुनियाभर के पापों का अकेले प्रायश्चित कर गए। उनका क्रॉस पर मरना झूठ साबित हो चुका है पर चर्च इसे जानते हुए भी नहीं मानता क्योंकि खरबों रुपये का उसका मतान्तरण का धंधा इसी झूठ पर टिका है।
क़ुरआन भी इसे स्वीकारता है कि ईसा मसीह की मौत सूली पर नहीं हुई थी। शोध यह भी कहते हैं कि ईसा मसीह मरियम के साथ भागकर कश्मीर आ गए, बौद्धों ने उन्हें बोधिसत्व कहा, लंबी आयु में वे कश्मीर में ही मरे, उनकी मज़ार को रोज़ाबल कहते हैं, मरियम रास्ते में ही मृत्यु को प्राप्त हुईं और वे जिस जगह मुदफ़न हैं उसे "मारी दा मज़ार" कहते हैं जो कश्मीर से सटे पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके में आता है।
ईसा मसीह के साथ जो यहूदी लोग कश्मीर आये उन्हें अभी भी वहाँ "बनी इसराइल" (अपना इज़राइल) कहते हैं और उनका मूल पेशा भी वही है जो 2000 हज़ार साल पहले आये उनके पूर्वजों का था: भेड़ पालन।
आज गोरो के सामने अस्मिता का संकट पैदा हो गया है कि उनके देवपुत्र ईसा मसीह को भारत ने न सिर्फ शरण दी बल्कि उनके पहले उपदेश (Sermon on the Mount) में भी महात्मा बुद्ध के सारनाथ प्रवचन की धमक है। और जो उनके पास है वह तो सेंट पॉल की धन्धेबाज़ी कला का नमूना मात्र है, वह चर्चियत है ईसाइयत नहीं। कहीं इसीलिए तो यह प्रयास नहीं हो रहा कि ईसा मसीह तो हुए ही नहीं? इस तरह भारत के वैचारिक और आध्यात्मिक स्रोतों से मुक्ति मिल जाएगी और अपना धंधा-ए-चर्च भी बना रहेगा क्योंकि चर्च से तो ईसा का वैसे ही कोई नाता नहीं।
पश्चिमी देशों में चर्च, सरकार और उनके रणनीतिक शोध तथा शिक्षा-संस्थानों में कितनी गहरी आंतरिक एकता और समन्वय है इसका अंदाज़ा अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन के उस फ़ैसले से लगाया जा सकता है जिसके तहत ओशो को अपमानित करके ओरेगॉन आश्रम से निकाला गया था । इस दौरान उन्हें थेलियम ज़हर दिए जाने के भी दावे किये जाते रहे हैं। लेकिन ओशो को निकाला क्यों गया था? उनको इसलिए निकाला गया था कि उन्होंने ईसा मसीह के भारत-संबंध और चर्च के झूठ को उजागर करने का साहस किया था।
जब यह तय है कि 25 दिसंबर ईसा मसीह का नकली जन्मदिन है तो क्यों न हम असली जन्मदिन पर अपना सांस्कृतिक दावा पेश कर दें और उन्हें बौद्ध परंपरा से मिले बोधिसत्व के सम्मान का विश्वव्यापी प्रचार करें? 25 दिसंबर को ईसा का जन्मदिन इसलिए मनाया जाने लगा कि इस दिन पहले से एक बड़ा त्यौहार मनाया जाता था और इसका लाभ उठाकर ईसाई मिशनरी इस त्यौहार को मनानेवालों को ईसाइयत में कन्वर्ट करना चाहते थे।
एक बात और। भारत में जन्मे हरगोविंद खुराना या चंद्रशेखर को मिले नोबेल पुरस्कार जिस तर्क से अमेरिका के खाते में जाते हैं उसी तर्क से ईसा मसीह भी भारत के खाते में आते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।
©चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह
नोट: Holger Kirsten की किताब Jesus Lived in India (Penguin, 1982) काम की है।

26.12.17
इस्लाम के बारे में मुकम्मल जानकारी रखना सिर्फ़ 'अल्लावालों' के लिए ही ज़रूरी नहीं है। पर ऐसा क्यों? काफ़िरों और मुशरीक़ों को क्या ग़रज़ पड़ी है कि "ईमान" की बातें जानें, उनपर अपना टाइम 'भेस्ट' करें?
इसे जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर एक नज़र डालें जो शांति के मजहब के सन्देश की महज़ बानगी हैं।
मेरी वाल से जुड़े फेसबुकिया बुद्धिवीर इस पोस्ट को कॉपी-पेस्ट करने की हिम्मत दिखाएँ। लगभग 5000 लोगों में जो ऐसा करेगा वही सत्य की खोज का साथी और बाक़ी फट्टू जिन्हें राम-राम कह ही देना चाहिए।
जिन शांतिदूतों को इन आयतों के हिंदी अर्थ और सन्दर्भ पर संदेह हो वे इनके असली अर्थ और सन्दर्भ बतायें ताकि मुशरीक़ और काफ़िर अँधेरे में न रहें कि अल्लापाक ने उनके लिए क्या-क्या फ़रमाया है:

1- ''फिर, जब पवित्र महीने बीत जाऐं, तो 'मुश्रिको' (मूर्तिपूजको ) को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। ( कुरान मजीद, सूरा 9, आयत 5) (कुरान 9:5) . www.quran.com/9/5 www.quranhindi.com/p260.htm
*
2- ''हे 'ईमान' लाने वालो (केवल एक आल्ला को मानने वालो ) 'मुश्रिक' (मूर्तिपूजक) नापाक (अपवित्र) हैं।'' (कुरान सूरा 9, आयत 28) . www.quran.com/9/28 www.quranhindi.com/p265.htm
*
3- ''निःसंदेह 'काफिर (गैर-मुस्लिम) तुम्हारे खुले दुश्मन हैं।'' (कुरान सूरा 4, आयत 101) . www.quran.com/4/101 www.quranhindi.com/p130.htm
*
4- ''हे 'ईमान' लाने वालों! (मुसलमानों) उन 'काफिरों' (गैर-मुस्लिमो) से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें सखती पायें।'' (कुरान सूरा 9, आयत 123) . www.quran.com/9/123 www.quranhindi.com/p286.htm
*
5- ''जिन लोगों ने हमारी ''आयतों'' का इन्कार किया (इस्लाम व कुरान को मानने से इंकार) , उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। निःसन्देह अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी हैं'' (कुरान सूरा 4, आयत 56) www.quran.com/4/56 www.quranhindi.com/p119.htm
*
6- ''हे 'ईमान' लाने वालों! (मुसलमानों) अपने बापों और भाईयों को अपना मित्र मत बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा 'कुफ्र' (इस्लाम को धोखा) को पसन्द करें। और तुम में से जो कोई उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे'' (कुरान सूरा 9, आयत 23) . www.quran.com/9/23 . . www.quranhindi.com/p263.htm .
*
7- ''अल्लाह 'काफिर' लोगों को मार्ग नहीं दिखाता'' (कुरान सूरा 9, आयत 37) . www.quran.com/9/37 . . www.quranhindi.com/p267.htm .
*
8- '' ऐ ईमान (अल्ला पर यकिन) लानेवालो! तुमसे पहले जिनको किताब दी गई थी, जिन्होंने तुम्हारे धर्म को हँसी-खेल बना लिया है, उन्हें और इनकार करनेवालों को अपना मित्र न बनाओ। और अल्लाह का डर रखों यदि तुम ईमानवाले हो (कुरान सूरा 5, आयत 57) . www.quran.com/5/57 www.quranhindi.com/p161.htm
*
9- ''फिटकारे हुए, (मुनाफिक) जहां कही पाए जाऐंगे पकड़े जाएंगे और बुरी तरह कत्ल किए जाएंगे।'' (कुरान सूरा 33, आयत 61) . www.quran.com/33/61 www.quranhindi.com/p592.htm
*
10- ''(कहा जाऐगा): निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे 'जहन्नम' का ईधन हो। तुम अवश्य उसके घाट उतरोगे।'' ( कुरान सूरा 21, आयत 98 . www.quran.com/21/98 www.quranhindi.com/p459.htm
*
11- 'और उस से बढ़कर जालिम कौन होगा जिसे उसके 'रब' की आयतों के द्वारा चेताया जाये और फिर वह उनसे मुँह फेर ले। निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना है।'' (कुरान सूरा 32, आयत 22) . www.quran.com/32/22 www.quranhindi.com/p579.htm
*
12- 'अल्लाह ने तुमसे बहुत सी 'गनीमतों' का वादा किया है जो तुम्हारे हाथ आयेंगी,''(लूट का माल) (कुरान सूरा 48, आयत 20) . www.quran.com/48/20 . . www.quranhindi.com/p713.htm
*
13- ''तो जो कुछ गनीमत (लूट का माल जैसे लूटा हुआ धन या औरते) तुमने हासिल किया है उसे हलाल (valid) व पाक समझ कर खाओ (उपयोग करो)' (कुरान सूरा 8, आयत 69) . www.quran.com/8/69 www.quranhindi.com/p257.htm
*
14- ''हे नबी! 'काफिरों' और 'मुनाफिकों' के साथ जिहाद करो, और उन पर सखती करो और उनका ठिकाना 'जहन्नम' है, और बुरी जगह है जहाँ पहुँचे'' (कुरान सूरा 66, आयत 9) . www.quran.com/66/9 www.quranhindi.com/p785.htm
*
15- 'तो अवश्य हम 'कुफ्र' (इस्लाम को धोखा देने वालो) करने वालों को यातना का मजा चखायेंगे, और अवश्य ही हम उन्हें सबसे बुरा बदला देंगे उस कर्म का जो वे करते थे।'' (कुरान सूरा 41, आयत 27) . www.quran.com/41/27 www.quranhindi.com/p662.htm
(आभार: श्री Naresh Shah)

www.quran.com


Who all represent today WE THE PEOPLE of our Constitution?

27.12.17
Who all represent today " WE THE PEOPLE" of our Constitution? Is our Constitution as rigid as Shari'a ?
.
Some people say that the lawmakers of today can't change the constitution, especially its basic structure.
Now the question is:
●Who constituted "...We the people of India..." who said that we "...give to ourselves..." the constitution of India?
This question raises further questions:
●How were those people elected or selected?
●Are the lawmakers of today any less representative of their people/constituencies?
●If yes, how and why?
●Or, was it a one time affair, i.e., only the Constituent Assembly had this power of representing the people of India and with them disappeared this power as well ?
●If yes, what was the source of this power?
Why so many amendments?
●Haven't some of these amendments already struck at the basic fabric of Indian society and polity?
●What is the basic structure of the constitution and is it independent of time and space?
●Is the basic structure independent of the change in the structure of the demography it serves?
● If yes, is the 'Constitution for the People' or are the 'People for the Constitution'?
●Finally, if the BASIC STRUCTURE is unalterable, how is the constitution different from Qur'an or Shari'a?
©ChandrakantPSingh

वामपंथियों के सामने राष्ट्रवादी क्यों पिछड़ते हैं?

28.12.17

वामपंथियों के सामने राष्ट्रवादी क्यों पिछड़ते हैं?
पिछले 100 सालों से पूरी दुनिया की बौद्धिकता पर वामपंथ हावी रहा है जिसके मूल में सत्य-विरोधी नैरेटिव है जो नैतिकता के छद्मावरण में पेश होता है और एक की विफलता के लिए दूसरे की सफलता को जिम्मेदार बताकर पूरे समाज में काहिली को बढ़ावा देता है। इस तरह वह निजी उद्यम को नीची निगाह से देखता है और अंततः धनोपार्जक को उत्पीड़क तथा निर्धन को पीड़ित साबित कर ख़ुद को पीड़ित की आवाज़ घोषित कर देता है।
●मनोविज्ञान बनाम अर्थशास्त्र

इस लिहाज से वामपंथ का अर्थशास्त्र से कम मनोविज्ञान से ज़्यादा गहरा रिश्ता है।कौन नहीं चाहेगा कि उसकी असफलताओं के लिए किसी और को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए?
राष्ट्रवादी इस वामपंथी छद्मावरण को डिकोड नहीं कर पाने के चलते वामी तर्कजाल में अक्सर उलझ जाते हैं। पूरे यूरोप-अमेरिका का यही हाल है। आज स्थिति यह है कि भारत समेत यूरोप-अमेरिका के ज्यादातर देशों में चुनावी जीत चाहे किसी भी पार्टी की हो, वैचारिक जीत वामियों की ही होती है।

●वामपंथ और इस्लाम

उपरोक्त संदर्भ में वामपंथ के बीज इस्लाम में छिपे दिख जाते हैं क्योंकि वहाँ भी मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या काफ़िर (ग़ैरमुसलमान) हैं और काफ़िरों को जेहाद के द्वारा मुसलमान बनाना या मिटा देना ही उनका सबसे पाक उद्देश्य है। इस प्रक्रिया में काफ़िरों की ज़र-जोरू-ज़मीन पर कब्ज़ा करना वैसे ही हलाल है जैसे वामपंथ में ख़ूनी क्रान्ति द्वारा धनी लोगों की लूट और उनका सफ़ाया वाजिब है।

लेकिन दोनों की पोलखोल उनके सत्ता में आने के बाद व्यवस्थाजनित विफलता से होती है। इस विफलता की जड़ में है मनुष्य की बेहतर संभावनाओं को कुचल कर उसे राज्याश्रित या किताबाश्रित बना दिया जाना जिसके बाद वह निजी उद्यम से ज्यादा लूट-खसोट को अपनी राह के रूप में चुनता है। सोवियत संघ का पतन, चीन का पूँजीवाद की राह पकड़ना और इस्लामी देशों के कलह इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

●एक मानसिक बीमारी

अपनी विफलता के लिए दूसरे की सफलता को जिम्मेदार ठहराकर ख़ुद को पीड़ित-दमित घोषित करने को अगर आधार-दृष्टि मान लिया जाए तो साम्यवाद-इस्लाम-जातिवाद आदि एक मानसिक बीमारी के सिवा कुछ भी नहीं जिनका ईलाज असंभव सा है क्योंकि इस बीमारी का जो शिकार होता है उसे अपनी बीमारी के बने रहने में ही अपना हित नज़र आता है।
मतलब यह भी कि सोये हुये को तो जगाया जा सकता है, लेकिन सोने का नाटक करनेवाले को कैसे जगाया जाए? अगर लोकतंत्र में ऐसे सोने का नाटक करनेवाले बहुमत में आ गए तो वे इस नाटक को ही असली और असल जीवन के धर्म(कार्य-व्यापार, कर्त्तव्य) को नकली घोषित करने में सफल हो जाएँगे। ऐसा ख़तरा आज पूरी दुनिया पर मँडरा रहा है।

●कट्टरता के स्रोत:अज्ञान, धूर्तता, परमज्ञान

अक्सर लोग यह कहते सुने जाते हैं वामपंथी या इस्लामवादी अपने उद्देश्य के प्रति इतने कट्टर होते हैं कि उनपर विश्वास सा होने लगता है। यहाँ यह सहज सवाल उठता है कि इस कट्टरता का स्रोत क्या है? कट्टरता के मूल स्रोत तीन ही होते हैं:
अज्ञान, धूर्तता या फिर परमज्ञान।

वामपंथ और इस्लाम का परमज्ञान से नाता इसलिए नहीं हो सकता कि परमज्ञान सर्वग्राही और समावेशी होगा, वह 'माले मुफ़्त दिले बेरहम' के सिद्धान्त पर टिका नहीं हो सकता। इसके बाद नंबर आता है अज्ञान और धूर्तता का। वामपंथ और इस्लाम दोनों के शीर्षस्थ और दार्शनिक स्तर पर तो धूर्तता ही प्रमुख है क्योंकि यह मानना मुश्किल है कि मूल विचार के प्रतिपादकों को जीवन और समाज की असलियत नहीं पता होती। लेकिन निचले स्तर पर लोगों को ऐसे दृष्टिगत पेंचोखम से परिचय नहीं होता और वे सीधे-सीधे इसे अपने तात्कालिक स्वार्थ या हित से जोड़कर देखते हैं। मतलब कट्टरता की जड़ में है आम लोगों का अज्ञान और ख़ास लोगों की धूर्तता।

हाँ, यह बात जरूर है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के कारण अब इस वामी-इस्लामी छद्मावरण और नाटक की पोल खुलने लगी है।
©चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह