ब्राह्मण विद्वेष (१): #यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी
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#ब्राह्मण_विद्वेष (१):
#यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी
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आज ब्राह्मण–विरोध भारत के शैक्षिक पाठ्यक्रम, राजनीतिक विमर्श और डिजिटल दुनिया का एक स्थायी, गहरा पैठा हिस्सा बन चुका है। #एनसीईआरटी की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास–पुस्तकों में दशकों तक (1970 के दशक से 2023 तक) यही पढ़ाया जाता रहा कि “हिंदू पुजारियों (ब्राह्मणों) ने ही लोगों को चार वर्णों में बाँटा, जन्म से ही #वर्ण_व्यवस्था थोपी, स्त्रियों और शूद्रों को वेद–समाधि–उपनिषदों के अध्ययन से वंचित रखा, और ‘अछूत’ या ‘अस्पृश्य’ शब्द का आविष्कार कर समाज को स्थायी रूप से तोड़ा"।
लेकिन जब RTI कार्यकर्ताओं ने इन दावों के प्रमाण माँगे, तो एनसीईआरटी के पास #ऋग्वेद, #मनुस्मृति या किसी #प्राचीन_ग्रंथ का स्पष्ट उद्धरण, पुरातात्विक साक्ष्य या ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं मिला; परिणामस्वरूप अप्रैल 2024 के पाठ्यक्रम–संशोधन में ये विवादास्पद कथन पूरी तरह हटा दिए गए ।
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फिर भी, ये सामग्री लाखों–करोड़ों बाल–मस्तिष्कों में गहरी पैठ बना चुकी है—आज के युवा स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणों को “सर्व–दोषी” मानते हैं। #इंस्टाग्राम, #ट्विटर (X) जैसे प्लेटफॉर्म इसका जीता–जागता प्रमाण हैं: एक ब्राह्मण युवती द्वारा अपनी सांस्कृतिक परम्परा या बचपन की कहानी साझा करने पर ही “तुम्हारी तरह सभी ब्राह्मण लड़कियों का सामूहिक बलात्कार हो जाए”, “#ब्राह्मणों_का_खून_बहना चाहिए” जैसी धमकियाँ और अपमानजनक गालियों की बौछार हो जाती है। यह नफरत केवल व्यक्तिगत नहीं, #सामूहिक_और_संगठित लगती है।
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राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति भिन्न नहीं। #योगी_आदित्यनाथ–शासित उत्तर प्रदेश जैसे #अपवादों को छोड़ दें तो शेष भारत में—चाहे केंद्र या राज्य में भाजपा शासित हो, कांग्रेस, द्रमुक, तृणमूल या वामपंथी दल सत्ता में हों—ब्राह्मण–विरोधी बयानबाज़ी, मीम्स या विमर्श को प्रत्यक्ष/परोक्ष संरक्षण या #मौन_सहमति मिलती दिखती है। क्या यह केवल “सामाजिक न्याय” की प्रतिक्रिया है, या सत्ता को स्थायी रखने वाली “#फूट_डालो_राज_करो” की आधुनिक, डिजिटल–संस्करण वाली नीति? यह प्रश्न निबंध का केंद्र है, जो हमें औपनिवेशिक जड़ों और वैश्विक समानताओं तक ले जाता है।
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औपनिवेशिक नीतियाँ और #ब्राह्मण_दुश्मन_की_रचना
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत में लम्बे समय तक सत्ता बनाए रखने के लिए “डिवाइड एंड रूल” को मूल नीति बनाया, जिसमें जाति–विभाजन सबसे प्रभावी हथियार साबित हुआ। 1871 की पहली अखिल–भारतीय #जनगणना से शुरू होकर 1931 तक की हर जनगणना में जातियों को कठोर, जन्म–आधारित श्रेणियों में बाँटा गया; #भूमि_व्यवस्था (Permanent Settlement), #शिक्षा_नीति (मैकाले मिनट, 1835) और प्रशासनिक भर्ती में #जाति_आरक्षण को औजार बनाया गया, जिससे प्राचीन काल की अपेक्षाकृत #लचीली_सामाजिक_व्यवस्था (“ जाति परिवर्तन” की संभावना) स्थायी संघर्षपूर्ण श्रेणियों में बदल गई।
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इस प्रक्रिया में #छुआछूत, अस्पृश्यता जैसी जटिल सामाजिक समस्याओं का सरलीकृत, राजनीतिक दोषारोपण ब्राह्मणों पर केंद्रित किया गया—“वे ही समाज को चार वर्णों में बाँटने वाले मूल अपराधी हैं, वे ही स्त्रियों–शूद्रों को ज्ञान से वंचित करने वाले दमनकारी हैं, वे ही ‘अछूत’ शब्द के जनक और संवाहक हैं।” एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक #विलियम_जोन्स (1784), मैकाले (“Minute on Indian Education”), #मैक्समूलर (Rigveda अनुवादक) जैसे औपनिवेशिक विद्वानों से लेकर #राममोहन_राय (ब्रह्म समाज), #ज्योतिबा_फूले (“गुलामगिरी”), पंडिता रमाबाई, डॉ. #अम्बेडकर (“Annihilation of Caste”), #पेरियार तक—विविध व्यक्तियों और आंदोलनों के विचारों को इस नैरेटिव में चुनिंदा ढंग से बुना गया।
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परिणाम भयावह: वास्तविक औपनिवेशिक शोषण—बंगाल में ज़मींदारी प्रथा से किसानों का खून–पसीना निचोड़ना, बंगाल अकाल (1770, 1943), करों की लूट, हस्तशिल्प–उद्योगों का विनाश, ब्रिटिश पूँजी को सब्सिडी—ये सब हाशिए पर चले गए; ध्यान “आदर्श अपराधी” ब्राह्मणों पर केंद्रित हो गया, जो न तो भूमि–मालिक वर्ग का प्रमुख हिस्सा थे, न औद्योगिक पूँजी के नियंत्रक, न जनसंख्या (3–5%) के अनुपात में सत्ता–प्रभाव रखते थे। आज एनसीईआरटी का 2024 संशोधन इसकी पुष्टि करता है कि ब्राह्मणों पर sweeping आरोपों के ठोस प्रमाण (जैसे मनुस्मृति या वेदों में स्पष्ट उद्धरण) उपलब्ध ही नहीं थे।
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स्वतंत्र भारत की सभी प्रमुख पार्टियाँ—#कांग्रेस से #भाजपा, #क्षेत्रीय_दलों तक—ने इस तैयार नैरेटिव को नए नारों (“सामाजिक न्याय”, “आरक्षण”), कानूनों और शिक्षा–नीतियों में ढाल लिया, जिससे यह औपनिवेशिक विरासत आज भी समाज को खोखला कर रही है। ( जारी...)
© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

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