Saturday, February 28, 2026

जातीय रसायन और जातीय अंकगणित की भिड़ंत

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जातीय रसायन और जातीय अंकगणित की भिड़ंत 
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मोदी जी पर कभी आँख मूंदकर विश्वास करने वाले अब उनके हर कृत्य पर संदेह कर रहे हैं। अगर यह सिर्फ #यूजीसी प्रकरण के कारण होता तो थम गया होता। #मोबाइल_इंटरनेट_सोशल मीडिया पर सवार एक ऐसी पीढ़ी की बदौलत मोदी तीन बार सत्ता में आए हैं जिसने अपनी #जातीय_अस्मिताओं को घोलकर #हिंदुत्व और #राष्ट्रभक्ति का एक #रसायन बनाया था और जिसके प्रतीक थे मोदी। 
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इस बीच #आडवाणी जी #जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर उन्हें सेकुलर घोषित कर चुके थे और #मोदी जी ने सार्वजनिक रूप से #जालीदार टोपी पहनने से #इनकार कर दिया था। लेकिन मौका मिलते ही मोदी जी ने जातीय #अंकगणित की मदद से इस रसायन के तत्वों को विघटित करना चाहा , कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से। 
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जनवरी २०२६ के यूजीसी दिशानिर्देश तो पहले से #सुलगते_बारूद के ढेर पर चिंगारी फेंकने जैसा साबित हुए। असल में यह विरोध मोदी के जातीय अंकगणित और नवजागृत हिंदुओं के जातीय रसायन के बीच है। 
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लोगों को यह साफ लग रहा है कि मोदी और संघ अब कांग्रेस - कम्युनिस्ट - समाजवादियों के विखंडनकारी जातीय अंकगणित के प्रयोग में अव्वल हो गए हैं। अब एक ही उपाय है कि मोबाइल - इंटरनेट - सोशल मीडिया पर चीन की तरह प्रतिबंध लगा दिया जाए तो मोदी जी कुछ समय और अपने #कालनेमी पाखंड को बरकरार रख सकते हैं। 
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#नवजागरण प्रेरित #हिंदुत्व और #हिंदू_एकता की राजधानी एक्सप्रेस का वैकम खोलकर मोदी और संघ अपनी #बौद्धिक_कायरता पर सार्वजनिक ठप्पा लगवा रहे हैं। 
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आप लोग बस एक काम करिए: २०१४ से लेकर अबतक की मोदी जी की तस्वीरों पर एक नजर डालिए और देखिए आपके दिमाग में किस प्राणी की तस्वीर उभर कर आ रही है? 
वन में तो शेर, व्याघ्र, चीता, हाथी, भालू, बिल्ली, बंदर, सियार और लोमड़ी समेत न जाने कितने जीव - जंतु रहते हैं। 
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आपसे कुछ सवाल भी करते चलें: 
रसायनशास्त्र और अंकगणित की भिड़ंत में मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र की भी कोई भूमिका है? 

अगर हाँ , मनोविज्ञान किसके साथ और अर्थशास्त्र किसके साथ? 

कहीं ये दोनों किसी एक ही पक्ष के साथ तो नहीं हैं? 

© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

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