ब्राह्मण विद्वेष (२) : #यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी
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#ब्राह्मण_विद्वेष (२)
#यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी
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स्वतंत्र भारत की सभी प्रमुख पार्टियाँ—#कांग्रेस से #भाजपा, #क्षेत्रीय दलों तक—ने इस तैयार नैरेटिव को नए नारों (“#सामाजिक_न्याय”, “#आरक्षण”), कानूनों और शिक्षा–नीतियों में ढाल लिया, जिससे यह औपनिवेशिक विरासत आज भी समाज को खोखला कर रही है।
भारतीय ब्राह्मण–द्वेष को यदि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक व्यापक #सत्ता_रणनीति का हिस्सा उभरता है, जहाँ मेहनती, बुद्धिमान, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी अल्पसंख्यक समुदाय को “सभी बुराइयों का कारण” घोषित कर सामाजिक असंतोष को मोड़ा जाता है। #यूरोप_में_यहूदियों_ने_यही_भूमिका_निभाई। द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–45) से कम से कम एक सदी पहले (19वीं सदी के प्रारंभ से) यहूदी–विरोधी माहौल गढ़ा गया: ईसाई परम्परा में ईश्वर–पुत्र माने गए ईसा मसीह (4 ई.पू.–30 ई.) स्वयं यहूदी थे और जीवनभर यहूदी ही रहे, फिर भी पोन्तियुस पीलातुस (रोमन गवर्नर) द्वारा उनके मृत्यु–दंड का नैरेटिव उलट दिया गया—“यहूदियों ने ही ईसा को सूली पर चढ़वाया” (न्यू टेस्टामेंट की व्याख्याएँ, मध्ययुगीन चर्च प्रचार); कार्ल मार्क्स के पिता हेनरिक मार्क्स को 1816 में अस्तित्व–भय से ईसाई बनना पड़ा, जबकि माँ हेनरीट्टा यहूदी रहीं—ये धार्मिक–सामाजिक दबाव के जीवंत उदाहरण हैं।
दूरदर्शी यहूदियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध से लगभग 50 वर्ष पूर्व (1880–90 के दशक से) वर्तमान इज़रायल (तब उस्मानी पालस्ताइन) के क्षेत्र में बाज़ार मूल्य से 4–5 गुना महँगी ज़मीनें खरीदना और बसना शुरू कर दिया था—यह आर्थिक निवेश से अधिक सर्वनाश की पूर्वानुमानित तैयारी थी (थियोडोर हर्ट्ज़ल की “डेर ज्यूडेनस्टाट”, 1896)।
1929–32 की महामंदी ने निर्णायक मोड़ लाया: जर्मनी में बेरोजगारी 33% से अधिक श्रमबल (6 मिलियन+) तक पहुँच गई, औद्योगिक उत्पादन 1929 स्तर से 40% गिर गया (Know Germany वेबसाइट; CBSE कक्षा 9 इतिहास–नोट्स: “Nazism and Rise of Hitler”)। अडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी (नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी) ने इस आर्थिक हताशा को सदियों पुरानी धार्मिक–आर्थिक ईर्ष्या से जोड़ दिया—यहूदियों को “राष्ट्र–द्रोही”, “सूदखोर”, “अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रकारी” बताया गया। नतीजा: 50 लाख यहूदियों का #सुनियोजित_नरसंहार (होलोकॉस्ट)। यहूदियों की एकमात्र “#गलती”? #कर्मठता_तीक्ष्णबुद्धि_व्यापार_वित्त_में_सफलता। भारत में ब्राह्मणों पर भी यही आरोप—“वे ही समाज तोड़ने वाले, ज्ञान–दमनकारी”—दोहराए जाते हैं। सत्ता हमेशा ऐसे #सक्षम_समुदाय_को_दुश्मन_बनाकर #बहुसंख्यक_असंतोष को नियंत्रित करती है।
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#आंतरिक_सत्ता_संघर्ष, #नवजागरण और #तटस्थता का अपराध
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भारत में ब्राह्मण–द्वेष #सत्ता_संघर्ष_का_औजार बना रहा। कांग्रेस ने 1948 में #गांधी_वध के बाद बॉम्बे प्रेसीडेंसी (पुणे, मुंबई, सतारा) में हजारों कोंकणस्थ #ब्राह्मणों_पर_संगठित_हिंसा को होने दिया—“गांधी को मारने वाले ब्राह्मण थे”; विभाजन–काल (1947) में गांधी–आश्वासनों पर भरोसा कर सुरक्षा–तैयारी न करने वाले लाखों हिंदुओं–सिखों का नरसंहार, बलात्कार, जबरिया इस्लामीकरण हुआ; पाकिस्तान–बांग्लादेश में हिंदू आबादी 20% से घटकर ~1.5% रह गई (मुख्यतः दलित, पूर्व–क्षत्रिय वंशज जो इस्लाम अस्वीकार करने पर मैला–ढोने जैसे अमानवीय कार्यों में धकेले गए)।
भाजपा–शासन (2014–26) में भी: SC-ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पर #सुप्रीम_कोर्ट के 2018 निर्णय (#पूर्व_जांच_अनिवार्य) को संसद ने 2018 संशोधन से पलट दिया, जिससे प्राकृतिक न्याय पर प्रश्न उठे। #कश्मीर_घाटी से 1990 के #पंडित_निष्कासन (नरसंहार–बलात्कार–जलावतनी) के 36 वर्ष बाद भी पुनर्वास नहीं; उसी समय #रोहिंग्या_मुसलमान बसाए गए। CAA (2019) के बावजूद पाक–बांग्लादेश हिंदू–दलित शरणार्थियों को सीमित नागरिकता। भाजपा–राज्यों में #हिंदू_मंदिरों पर 19वीं सदी से #सरकारी_नियंत्रण जारी—दान–कोष का सरकारी उपयोग, जबकि पूर्व–औपनिवेशिक हिंदू राजाएँ मंदिरों को दान देते थे।
#भाजपा_का_कांग्रेसीकरण पूर्ण: परिवारवाद कम, लेकिन नीतियाँ समान; कांग्रेस मुस्लिम लीग–जैसी हो गई है; संघ प्रमुख का कथन कि—“#हमने_हिंदुओं_का_ठेका_नहीं_लिया”—संगठन के सेकुलर–परिवर्तन का संकेत है। डिजिटल नवजागरण (मोबाइल–सोशल मीडिया से शास्त्र–इतिहास पुनरावलोकन) सत्ता के "फूट डालो राज करो" की रणनीति के लिए खतरा बन गया है, इसलिए ब्राह्मण–द्वेष को हवा देकर इस नवजागरण हिंदू एकता को नियंत्रित करने की साज़िश चल रही है। भाजपा में दो गुट हो गए हैं। पार्टी के शीर्ष पर बैठा गुट “फूट डालो राज करो " की अनीति पर चल रहा है तो दूसरा गुट "सांस्कृतिक भारत–निर्माण" का पक्षधर है। पहले गुट के शीर्ष पर मोदी - शाह की जोड़ी है तो दूसरे के प्रतिनिधि योगी आदित्यनाथ। सवाल है कि राष्ट्रपति दलित, पीएम पिछड़ा—फिर भी समाज–तोड़क यूजीसी दिशानिर्देश लाए ही क्यों गए? जेएनयू की कुलपति प्रो धूलिश्री पंडित ने खुलकर इसके विरोध में कहा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी।
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अब आपको तय करना है कि आप #राव_कालनेमी के साथ हैं या #राम_हनुमान के ? चुप्पी अपराध है। जय श्रीराम! ( समाप्त)
© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह