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Thursday, February 26, 2026

ब्राह्मण विद्वेष (२) : #यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी

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#ब्राह्मण_विद्वेष (२)
#यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी 
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स्वतंत्र भारत की सभी प्रमुख पार्टियाँ—#कांग्रेस से #भाजपा, #क्षेत्रीय दलों तक—ने इस तैयार नैरेटिव को नए नारों (“#सामाजिक_न्याय”, “#आरक्षण”), कानूनों और शिक्षा–नीतियों में ढाल लिया, जिससे यह औपनिवेशिक विरासत आज भी समाज को खोखला कर रही है।

भारतीय ब्राह्मण–द्वेष को यदि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक व्यापक #सत्ता_रणनीति का हिस्सा उभरता है, जहाँ मेहनती, बुद्धिमान, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी अल्पसंख्यक समुदाय को “सभी बुराइयों का कारण” घोषित कर सामाजिक असंतोष को मोड़ा जाता है। #यूरोप_में_यहूदियों_ने_यही_भूमिका_निभाई। द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–45) से कम से कम एक सदी पहले (19वीं सदी के प्रारंभ से) यहूदी–विरोधी माहौल गढ़ा गया: ईसाई परम्परा में ईश्वर–पुत्र माने गए ईसा मसीह (4 ई.पू.–30 ई.) स्वयं यहूदी थे और जीवनभर यहूदी ही रहे, फिर भी पोन्तियुस पीलातुस (रोमन गवर्नर) द्वारा उनके मृत्यु–दंड का नैरेटिव उलट दिया गया—“यहूदियों ने ही ईसा को सूली पर चढ़वाया” (न्यू टेस्टामेंट की व्याख्याएँ, मध्ययुगीन चर्च प्रचार); कार्ल मार्क्स के पिता हेनरिक मार्क्स को 1816 में अस्तित्व–भय से ईसाई बनना पड़ा, जबकि माँ हेनरीट्टा यहूदी रहीं—ये धार्मिक–सामाजिक दबाव के जीवंत उदाहरण हैं।  

दूरदर्शी यहूदियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध से लगभग 50 वर्ष पूर्व (1880–90 के दशक से) वर्तमान इज़रायल (तब उस्मानी पालस्ताइन) के क्षेत्र में बाज़ार मूल्य से 4–5 गुना महँगी ज़मीनें खरीदना और बसना शुरू कर दिया था—यह आर्थिक निवेश से अधिक सर्वनाश की पूर्वानुमानित तैयारी थी (थियोडोर हर्ट्ज़ल की “डेर ज्यूडेनस्टाट”, 1896)।  

1929–32 की महामंदी ने निर्णायक मोड़ लाया: जर्मनी में बेरोजगारी 33% से अधिक श्रमबल (6 मिलियन+) तक पहुँच गई, औद्योगिक उत्पादन 1929 स्तर से 40% गिर गया (Know Germany वेबसाइट; CBSE कक्षा 9 इतिहास–नोट्स: “Nazism and Rise of Hitler”)। अडोल्फ हिटलर और नाजी पार्टी (नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी) ने इस आर्थिक हताशा को सदियों पुरानी धार्मिक–आर्थिक ईर्ष्या से जोड़ दिया—यहूदियों को “राष्ट्र–द्रोही”, “सूदखोर”, “अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रकारी” बताया गया। नतीजा: 50 लाख यहूदियों का #सुनियोजित_नरसंहार (होलोकॉस्ट)। यहूदियों की एकमात्र “#गलती”? #कर्मठता_तीक्ष्णबुद्धि_व्यापार_वित्त_में_सफलता। भारत में ब्राह्मणों पर भी यही आरोप—“वे ही समाज तोड़ने वाले, ज्ञान–दमनकारी”—दोहराए जाते हैं। सत्ता हमेशा ऐसे #सक्षम_समुदाय_को_दुश्मन_बनाकर #बहुसंख्यक_असंतोष को नियंत्रित करती है।
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#आंतरिक_सत्ता_संघर्ष, #नवजागरण और #तटस्थता का अपराध 
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भारत में ब्राह्मण–द्वेष #सत्ता_संघर्ष_का_औजार बना रहा। कांग्रेस ने 1948 में #गांधी_वध के बाद बॉम्बे प्रेसीडेंसी (पुणे, मुंबई, सतारा) में हजारों कोंकणस्थ #ब्राह्मणों_पर_संगठित_हिंसा को होने दिया—“गांधी को मारने वाले ब्राह्मण थे”; विभाजन–काल (1947) में गांधी–आश्वासनों पर भरोसा कर सुरक्षा–तैयारी न करने वाले लाखों हिंदुओं–सिखों का नरसंहार, बलात्कार, जबरिया इस्लामीकरण हुआ; पाकिस्तान–बांग्लादेश में हिंदू आबादी 20% से घटकर ~1.5% रह गई (मुख्यतः दलित, पूर्व–क्षत्रिय वंशज जो इस्लाम अस्वीकार करने पर मैला–ढोने जैसे अमानवीय कार्यों में धकेले गए)।  

भाजपा–शासन (2014–26) में भी: SC-ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पर #सुप्रीम_कोर्ट के 2018 निर्णय (#पूर्व_जांच_अनिवार्य) को संसद ने 2018 संशोधन से पलट दिया, जिससे प्राकृतिक न्याय पर प्रश्न उठे। #कश्मीर_घाटी से 1990 के #पंडित_निष्कासन (नरसंहार–बलात्कार–जलावतनी) के 36 वर्ष बाद भी पुनर्वास नहीं; उसी समय #रोहिंग्या_मुसलमान बसाए गए। CAA (2019) के बावजूद पाक–बांग्लादेश हिंदू–दलित शरणार्थियों को सीमित नागरिकता। भाजपा–राज्यों में #हिंदू_मंदिरों पर 19वीं सदी से #सरकारी_नियंत्रण जारी—दान–कोष का सरकारी उपयोग, जबकि पूर्व–औपनिवेशिक हिंदू राजाएँ मंदिरों को दान देते थे।  

#भाजपा_का_कांग्रेसीकरण पूर्ण: परिवारवाद कम, लेकिन नीतियाँ समान; कांग्रेस मुस्लिम लीग–जैसी हो गई है; संघ प्रमुख का कथन कि—“#हमने_हिंदुओं_का_ठेका_नहीं_लिया”—संगठन के सेकुलर–परिवर्तन का संकेत है। डिजिटल नवजागरण (मोबाइल–सोशल मीडिया से शास्त्र–इतिहास पुनरावलोकन) सत्ता के "फूट डालो राज करो" की रणनीति के लिए खतरा बन गया है, इसलिए ब्राह्मण–द्वेष को हवा देकर इस नवजागरण हिंदू एकता को नियंत्रित करने की साज़िश चल रही है। भाजपा में दो गुट हो गए हैं। पार्टी के शीर्ष पर बैठा गुट “फूट डालो राज करो " की अनीति पर चल रहा है तो दूसरा गुट "सांस्कृतिक भारत–निर्माण" का पक्षधर है। पहले गुट के शीर्ष पर मोदी - शाह की जोड़ी है तो दूसरे के प्रतिनिधि योगी आदित्यनाथ। सवाल है कि राष्ट्रपति दलित, पीएम पिछड़ा—फिर भी समाज–तोड़क यूजीसी दिशानिर्देश लाए ही क्यों गए? जेएनयू की कुलपति प्रो धूलिश्री पंडित ने खुलकर इसके विरोध में कहा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। 
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अब आपको तय करना है कि आप #राव_कालनेमी के साथ हैं या #राम_हनुमान के ? चुप्पी अपराध है। जय श्रीराम! ( समाप्त) 

© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

ब्राह्मण विद्वेष (१): #यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी

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#ब्राह्मण_विद्वेष (१):
#यहूदियों_की_तरह_ब्राह्मण_संहार_की_पूर्व_तैयारी 
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आज ब्राह्मण–विरोध भारत के शैक्षिक पाठ्यक्रम, राजनीतिक विमर्श और डिजिटल दुनिया का एक स्थायी, गहरा पैठा हिस्सा बन चुका है। #एनसीईआरटी की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास–पुस्तकों में दशकों तक (1970 के दशक से 2023 तक) यही पढ़ाया जाता रहा कि “हिंदू पुजारियों (ब्राह्मणों) ने ही लोगों को चार वर्णों में बाँटा, जन्म से ही #वर्ण_व्यवस्था थोपी, स्त्रियों और शूद्रों को वेद–समाधि–उपनिषदों के अध्ययन से वंचित रखा, और ‘अछूत’ या ‘अस्पृश्य’ शब्द का आविष्कार कर समाज को स्थायी रूप से तोड़ा"। 
लेकिन जब RTI कार्यकर्ताओं ने इन दावों के प्रमाण माँगे, तो एनसीईआरटी के पास #ऋग्वेद, #मनुस्मृति या किसी #प्राचीन_ग्रंथ का स्पष्ट उद्धरण, पुरातात्विक साक्ष्य या ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं मिला; परिणामस्वरूप अप्रैल 2024 के पाठ्यक्रम–संशोधन में ये विवादास्पद कथन पूरी तरह हटा दिए गए । 
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फिर भी, ये सामग्री लाखों–करोड़ों बाल–मस्तिष्कों में गहरी पैठ बना चुकी है—आज के युवा स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणों को “सर्व–दोषी” मानते हैं। #इंस्टाग्राम, #ट्विटर (X) जैसे प्लेटफॉर्म इसका जीता–जागता प्रमाण हैं: एक ब्राह्मण युवती द्वारा अपनी सांस्कृतिक परम्परा या बचपन की कहानी साझा करने पर ही “तुम्हारी तरह सभी ब्राह्मण लड़कियों का सामूहिक बलात्कार हो जाए”, “#ब्राह्मणों_का_खून_बहना चाहिए” जैसी धमकियाँ और अपमानजनक गालियों की बौछार हो जाती है। यह नफरत केवल व्यक्तिगत नहीं, #सामूहिक_और_संगठित लगती है।  
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राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति भिन्न नहीं। #योगी_आदित्यनाथ–शासित उत्तर प्रदेश जैसे #अपवादों को छोड़ दें तो शेष भारत में—चाहे केंद्र या राज्य में भाजपा शासित हो, कांग्रेस, द्रमुक, तृणमूल या वामपंथी दल सत्ता में हों—ब्राह्मण–विरोधी बयानबाज़ी, मीम्स या विमर्श को प्रत्यक्ष/परोक्ष संरक्षण या #मौन_सहमति मिलती दिखती है। क्या यह केवल “सामाजिक न्याय” की प्रतिक्रिया है, या सत्ता को स्थायी रखने वाली “#फूट_डालो_राज_करो” की आधुनिक, डिजिटल–संस्करण वाली नीति? यह प्रश्न निबंध का केंद्र है, जो हमें औपनिवेशिक जड़ों और वैश्विक समानताओं तक ले जाता है।
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औपनिवेशिक नीतियाँ और #ब्राह्मण_दुश्मन_की_रचना 

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत में लम्बे समय तक सत्ता बनाए रखने के लिए “डिवाइड एंड रूल” को मूल नीति बनाया, जिसमें जाति–विभाजन सबसे प्रभावी हथियार साबित हुआ। 1871 की पहली अखिल–भारतीय #जनगणना से शुरू होकर 1931 तक की हर जनगणना में जातियों को कठोर, जन्म–आधारित श्रेणियों में बाँटा गया; #भूमि_व्यवस्था (Permanent Settlement), #शिक्षा_नीति (मैकाले मिनट, 1835) और प्रशासनिक भर्ती में #जाति_आरक्षण को औजार बनाया गया, जिससे प्राचीन काल की अपेक्षाकृत #लचीली_सामाजिक_व्यवस्था (“ जाति परिवर्तन” की संभावना) स्थायी संघर्षपूर्ण श्रेणियों में बदल गई। 
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इस प्रक्रिया में #छुआछूत, अस्पृश्यता जैसी जटिल सामाजिक समस्याओं का सरलीकृत, राजनीतिक दोषारोपण ब्राह्मणों पर केंद्रित किया गया—“वे ही समाज को चार वर्णों में बाँटने वाले मूल अपराधी हैं, वे ही स्त्रियों–शूद्रों को ज्ञान से वंचित करने वाले दमनकारी हैं, वे ही ‘अछूत’ शब्द के जनक और संवाहक हैं।” एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक #विलियम_जोन्स (1784), मैकाले (“Minute on Indian Education”), #मैक्समूलर (Rigveda अनुवादक) जैसे औपनिवेशिक विद्वानों से लेकर #राममोहन_राय (ब्रह्म समाज), #ज्योतिबा_फूले (“गुलामगिरी”), पंडिता रमाबाई, डॉ. #अम्बेडकर (“Annihilation of Caste”), #पेरियार तक—विविध व्यक्तियों और आंदोलनों के विचारों को इस नैरेटिव में चुनिंदा ढंग से बुना गया।  
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परिणाम भयावह: वास्तविक औपनिवेशिक शोषण—बंगाल में ज़मींदारी प्रथा से किसानों का खून–पसीना निचोड़ना, बंगाल अकाल (1770, 1943), करों की लूट, हस्तशिल्प–उद्योगों का विनाश, ब्रिटिश पूँजी को सब्सिडी—ये सब हाशिए पर चले गए; ध्यान “आदर्श अपराधी” ब्राह्मणों पर केंद्रित हो गया, जो न तो भूमि–मालिक वर्ग का प्रमुख हिस्सा थे, न औद्योगिक पूँजी के नियंत्रक, न जनसंख्या (3–5%) के अनुपात में सत्ता–प्रभाव रखते थे। आज एनसीईआरटी का 2024 संशोधन इसकी पुष्टि करता है कि ब्राह्मणों पर sweeping आरोपों के ठोस प्रमाण (जैसे मनुस्मृति या वेदों में स्पष्ट उद्धरण) उपलब्ध ही नहीं थे। 
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स्वतंत्र भारत की सभी प्रमुख पार्टियाँ—#कांग्रेस से #भाजपा, #क्षेत्रीय_दलों तक—ने इस तैयार नैरेटिव को नए नारों (“सामाजिक न्याय”, “आरक्षण”), कानूनों और शिक्षा–नीतियों में ढाल लिया, जिससे यह औपनिवेशिक विरासत आज भी समाज को खोखला कर रही है। ( जारी...)
© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

NCERT पाठ्य-पुस्तकों का नहीं बदलना एक संयोग नहीं बल्कि प्रयोग


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#यूजीसी प्रकरण के बाद अब आप विश्वास से कह सकते हैं कि हिंदू द्वेषी #NCERT पाठ्य-पुस्तकों का नहीं बदला जाना एक #संयोग नहीं बल्कि #प्रयोग था। तर्क यह कि जब समाज को बांटना ही उद्देश्य है तो बांटने का जो काम पहले से चला आ रहा है, उसे क्यों रोका जाए? चाहे यह काम अंग्रेजों का हो या नेहरू जी का फिर उनकी बेटी इंदिरा जी या फिर उनके नाती राजीव जी का या फिर उनकी नतिन पुतोहु द्वारा नियंत्रित मनमोहन सिंह सरकार का। 

पहले लोग खीज से कहते थे कि मोदी सरकार एक दशक में भी मानसिक गुलामी और हिंदू विद्वेष को बढ़ावा देने वाली NCERT पाठ्य- पुस्तकों को अबतक नहीं बदल पाई। यह भी कि अगर कांग्रेस को यह काम करना होता तो उसे छह महीने से अधिक नहीं लगते। 

जिस गति से मोदी के दौर में अंग्रेजों और उनकी पालित कांग्रेस की '#बांटो_और_राज_करो ' की नीति को आगे बढ़ाया गया है उससे तो लगता है कि #औपनिवेशिक शासन की सच्ची वारिस अब भाजपा हो गई है क्योंकि उसने न सिर्फ अपना #कांग्रेसीकरण किया है बल्कि कांग्रेस को मुस्लिग लीग के रास्ते चलने को बाध्य कर दिया है। 

यही नहीं #संघ जिसकी स्थापना ही खिलाफत आंदोलन के बाद #मोपला_हिंदू_नरसंहार के प्रतिक्रिया- स्वरूप १९२५ में हुई थी, वह अब गर्व से कहता है कि उसने #हिंदुओं_का_ठेका नहीं ले रखा है ' क्योंकि वह एक राष्ट्रीय मतलब सेकुलर संगठन है'! तो फिर कौन सी संस्था हिंदुओं के जायज हितों का प्रतिनिधित्व करती है? आज की तारीख में न कोई पार्टी न कोई संगठन। 

इतना ही नहीं #जाति_नामक_सामाजिक संस्था जो अबतक हिंदुओं को विलुप्ति से सदियों से बचाते आई है, उसे भी #समाज_तोड़क_कानून द्वारा आपस में लड़ाकर- भिड़ाकर समाप्त किया जा रहा है। 

यह कोई विस्मय की बात नहीं है कि जब १९९० में केंद्र में भाजपा समर्थित वी पी सिंह की सरकार थी तब #कश्मीर घाटी में #हिंदुओं_का_नरसंहार हुआ और लाखों लोगों को घर - बार छोड़कर सिर्फ हिंदू होने के कारण अपने ही देश में शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा। स्थिति आज भी नहीं बदली है क्योंकि जिस जम्मू-कश्मीर में हजारों अवैध #बांग्लादेशी और #रोहिंग्या घुसपैठियों को बसाया गया है, उसी राज्य के मूल निवासी सिर्फ हिंदू होने के कारण पुनर्वास और घरवापसी से कोसों दूर है। 
@ चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह 
#modithedivider #BJP_IS_CONGRESS #Congress_Is_Muslim_League #Jaati #UGC #KashmiriPandits #KashmiriHindus #EthnicCleansing #RSSorg #Rohingya #RSS_IS_SECULAR_NOW #NCERT

सवर्णों का अंतर्द्वंद्व

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हिंदू एकता के मामले में पक्ष और विपक्ष की पार्टियों में वही अंतर है जो कालनेमी और रावण में है। स्पष्ट है, रावण है तो ही कालनेमी है। इसमें समझने की बात यह है कि पिछले दो सौ सालों से सत्ता का चरित्र ही ऐसा हो गया है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी जनता को उत्पीड़क और उत्पीड़ित की काल्पनिक श्रेणियों में बांटकर सत्ता तक पहुंचने की अपनी राह को आसान करती है। सत्ता के इस चरित्र को समाप्त नहीं किया जा सकता है लेकिन इसके दुष्प्रभाव को कम अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए अपनी जायज मांगे मनवाने के लिए भी आपको साहेब, राहुल गाँधी या उनकी पार्टियों को अपना संघर्ष आउटसोर्स करने का लालच त्यागना पड़ेगा। 
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सामान्य श्रेणी के शहरी हिंदुओं ने समझ लिया है कि उनका काम वोट देना है बाकी का काम उनकी चहेती पार्टी और उसके नेता कर देंगे? ऐसा हुआ है क्या? मोदी या मोदी की भाजपा ने कौन सा ऐसा काम किया है जो सवर्णों के साथ हुए कानून पोषित अन्याय को कम किया है? उल्टे SC - ST अधिनियम को न्यायपूर्ण बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के २०१८ के फैसले को ही अतिमानव साहेब जी ने पलट दिया जिसके तहत आरोप ही प्रमाण है! आरोपी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई के लिए किसी प्रारंभिक जाँच की भी जरूरत नहीं है। 
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सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए कि मोदी को डर था कि आगामी २०१९ के लोकसभा चुनाव में SC - ST के लोग कहीं उनके खिलाफ एकजुट न हो जाए। यह डर क्यों पैदा हुआ? इसलिए कि खासकर SC के जातीय संगठन और उनको हवा देनेवाले सड़क पर उतर गए थे और राष्ट्रव्यापी उत्पात की धमकी देने लगे थे। उन्होंने अपनी गैर - वाजिब लड़ाई भी किसी को आउटसोर्स नहीं की है और न ही हिंदू एकता के नाम पर अपने हितों के साथ कोई समझौता किया है। यही रणनीति मजहबी, ईसाई और कम्युनिस्ट संगठन अपनाते हैं। 
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वोटबैंक की राजनीति हमेशा एक नकली उत्पीड़क और नकली पीड़ित की तलाश में रहती है। इससे राजनीतिज्ञों का काम तो आसान होता ही है, लोगों का ध्यान भी नेताओं की घटिया नीति और नीयत की ओर कम जाता है। यह बात अंग्रेजों से लेकर कांग्रेस और भाजपा शासन तक लागू है। फिर इसका इलाज क्या है? 
इसका इलाज है संगठित भीड़ बनकर अपनी अस्तित्व रक्षा के धर्म को निभाने के लिए सड़क पर उतरना। शाहीनबाग और आढ़तिया किसानों के आंदोलन इसके ताजा उदाहरण हैं। हालांकि ये आंदोलन न न्यायसम्मत थे और न ही नितिसम्मत लेकिन भीड़तंत्र के इस्तेमाल ने वोटबैंक केंद्रित लोकतंत्र को झुकाने में सफलता पाई। 
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उपरोक्त उदाहरणों से जाहिर है कि SC- ST अधिनियम से पहले से ही पीड़ित सामान्यवर्ग के हिंदू अगर अपनी न्यायपूर्ण मांग के लिए २०१८ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समर्थन में संगठित भीड़ बनकर सड़क पर उतरे होते तो मोदी सरकार २०२६ के यूजीसी दिशानिर्देश लाने की हिम्मत नहीं करती क्योंकि तब साहेब जी को लगता कि SC-ST वोट बैंक को साथ लाने के चक्कर में कहीं पहले से चट्टान की तरह साथ देनेवाला वोटबैंक खिसक न जाए। 
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इसी बात को कुछ और उदाहरणों से समझते हैं। हिंदू मंदिरों पर अंग्रेजों के समय से ही सरकारी नियंत्रण है। लेकिन चर्च, वक्फ , गुरुद्वारा आदि सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हैं। हिंदुओं के साथ लगभग दो सौ सालों से हो रहे इस जगजाहिर भेदभाव को सरकार संसद में बिना कोई कानून पास किए महज एक सरकारी ऑर्डर से खत्म कर सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ? क्यों नहीं हुआ? 
इसलिए नहीं हुआ कि उपरोक्त सरकारी नियंत्रण के विरुद्ध हिंदुओं की भीड़ सड़क पर नहीं उतरी। फिर प्रश्न उठता है कि हिन्दुत्व का दम भरनेवाली और हिंदू नवजागरण की लहर पर सवार होकर आई सरकार बिना किसी आंदोलन के भी तो ऐसा कर सकती थी पर किया नहीं क्योंकि उसे वोटबैंक के खिसकने कोई खतरा नहीं महसूस हुआ। 
दूसरी तरफ मंदिरों से यानी उनसे मिलने वाले हजारों करोड़ के दान से सरकारी नियंत्रण को खत्म करने से सत्ता संस्थान को नुकसान ही नुकसान है। अगर इन हजारों करोड़ों के हिंदूदान से सिर्फ हिंदुओं के लिए स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, अस्पताल और उद्योगतंत्र खड़े कर दिए गए तो सरकार पर हिंदू वोटबैंक की निर्भरता कम हो जाएगी। फिर सरकार से भ्रष्टाचार, लेट - लतीफी, अन्यायपूर्ण न्यायव्यवस्था आदि पर लोग सवाल पूछने लगेंगे। इसलिए सत्ता की राजनीति अपने वोटबैंक को पीड़ित और उत्पीड़क की नकली श्रेणियों में बांटने का आसान रास्ता चुनती है। 
मजे की बात यह है कि इसमें पक्ष - विपक्ष सब शामिल होते हैं बल्कि एक - दूसरे की मदद करते हैं। अभी ई. सन् २०२६ चल रहा है। २०१४ से अबतक केंद्र की मोदी सरकार भारत के पश्चिम बंगाल से सटे बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग का काम पूरा नहीं कर पाई है। तर्क दिया जाता है कि राज्य की ममता सरकार ने इसके लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराया। लेकिन केंद्र सरकार को अधिकार है कि वह राज्य सरकार को इस काम के लिए मजबूर कर सकती है। क्यों नहीं किया? क्योंकि ऐसा करने का कोई तात्कालिक दबाव नहीं है, कोई समूह इसके लिए संगठित भीड़ बनकर सड़क पर उतरने के लिए राजी नहीं है। लेकिन केंद्र सरकार के इस अनिर्णय से ममता बनर्जी का बांग्लादेशी घुसपैठियों वाला वोटबैंक प्रसन्न है। यह वोटबैंक अपनी अस्तित्व- रक्षा के लिए चौबीसों घंटे सड़क पर उतरने के लिए तैयार है। 
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इस बात को एक अन्य उदाहरण से भी समझा जा सकता है। ३६ सालों से लाखों कश्मीरी हिंदू अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी तो इस मामले को जोर - शोर से उठाती थी ( हालांकि घाटी से जब कश्मीरी हिंदुओं को सिर्फ हिंदू होने के कारण घाटी छोड़ने को मजबूर किया गया तो केंद्र में भाजपा समर्थित वी पी सिंह की सरकार थी जिसमें कश्मीर के ही मुफ्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे)। आज एक दशक से अधिक के भाजपा शासन में भी कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास नहीं हुआ है, क्यों? इसलिए कि कश्मीरी हिंदुओं की आबादी तीतर - बीतर हो गई है, वे संगठित भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी वाजिब मांग के लिए भी सड़क पर उतरने में सक्षम नहीं है और वोटबैंक वाली राजनीति को उनसे कोई खतरा नहीं है। ऐसे में कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास का मामले की हैसियत एक मुद्दा से अधिक नहीं है। दूसरी तरफ इसी बीच अपनी वोटबैंक वाली ताकत के कारण लगभग ५० हजार रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों जम्मू - कश्मीर राज्य में बसाये जा चुके हैं। 
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अंतिम बात। हिंदुओं की एकता और अस्तित्व का आधार जाति रही है। सामान्य श्रेणी के हिंदुओं की वर्तमान विकट स्थिति का आधार भी जाति ही है। संविधान भी जाति को मजहब या धर्म से कहीं अधिक मान्यता देता है। ऐसे में यह इसी श्रेणी के लोगों के ऊपर निर्भर है कि वे अपनी अस्तित्व- रक्षा के लिए जाति का किस तरह से इस्तेमाल करते हैं। कोई दूसरा यह काम उनके लिए नहीं करेगा। दूसरा सिर्फ और सिर्फ उनको उत्पीड़क घोषित करने का नकली नैरेटिव गढ़ने में जमीन - आसमान एक कर देगा। हां, अस्तित्व-रक्षा के लिए एक संगठित भीड़ के रूप में सड़क पर उतरना सामान्य श्रेणी के लोगों का राष्ट्रीय धर्म है जिससे विमुख होना शुद्ध रूप से अधार्मिक और कायरता है। 
© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह

जनता कम्युनल, देश है सेकुलर

जनता कम्युनल, देश है सेकुलर

'पीके' सेकुलर 'लज्जा' कम्युनल
रुश्दी और तस्लीमा कम्युनल
जय हो हिन्दुस्तान सेकुलर!

बाल- तिलक -अरबिन्दो कम्युनल
गाँधी-पटेल-सावरकर हिन्दू
पंडित नेहरू ठहरे सेकुलर
जय हो हिन्दुस्तान सेकुलर!

शिवा-राणा प्रताप कम्युनल
अकबर सेकुलर हेमू कम्युनल
नादिर-औरंगज़ेब सेकुलर
खिलजी-तुग़लक़-बाबर सेकुलर
जय हो हिन्दुस्तान सेकुलर!

सबकुछ मुस्लिम-ईसाई सेकुलर
कुछ-कुछ हिन्दू भी हो सेकुलर
कुछ भी हिन्दू-विरोधी सेकुलर
कुछ भी देश-विरोधी सेकुलर
जय हो हिन्दुस्तान सेकुलर!

बहुमत कम्युनल, अल्पमत सेकुलर
जनता कम्युनल देश है सेकुलर
जय हो हिन्दुस्तान सेकुलर!
(२६.२.२०१५)
              --- चन्द्रकान्त प्र. सिंह

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वीर सावरकर की स्मृति में

श्री Bhagwan Singh जी की वॉल से साभार: 
"धूर्त को उसके किए की सजा मिल गयी‌
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दो आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद सावरकर को बंबई के डोगरी जेल में रखा गया। यही पर उन्हें जेल के कपड़े दिए गये और गले में पहनने के लिए एक गोल सरिया भी दिया गया जिसपर 1960 नंबर अंकित था जो जेल से उनके छूटने का वर्ष भी था।

इसी दौरान कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक सर हेनरी कॉटन एक सभा में बोलते हुए सावरकर की तस्वीर को देखा और कहा की अफसोस की उज्जवल भविष्य वाला एक युवा, एक प्रतिभाशाली व्यक्ति आज कितनी दयनीय स्थिति में पहुंच गया है। इस बयान पर विवाद हो गया । कांग्रेस ने तुरंत अपने संस्थापक के बयानों से अपने को अलग किया। कांग्रेस सत्र के अध्यक्ष सर विलियम बैडरबर्न और सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने भी बयान जारी करके कहा कि वह विनायक सावरकर जैसे व्यक्ति के लिए सर हेनरी कॉटन की संवेदनाओं की पैरवी नहीं करते हैं।

इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यह थी कि राष्ट्रवादी कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक के "केसरी"ने भी हेनरी कॉटन का निजी विचार कहते हुए खुद को इससे अलग कर लिया।

जहां एक तरफ विदेशी और यूरोपियन समाचार पत्र विनायक दामोदर सावरकर को एक वीर देशभक्त कह रहे थे वहीं भारतीय समाचार पत्र बचाव की मुद्रा अपनाते हुए डर रहे थे उन पर अंतिम फैसला आने के बाद "द टाइम्स आफ इंडिया" के आलेख का दुर्भाग्यपूर्ण शीर्षक था--

"धूर्त को उसके किए की सजा मिल गयी‌"

1 महीने बाद सावरकर को डोंगरी जेल से मुंबई के ही बायकुला जेल लाया गया। डोगरी में विनायक को दूध और रोटी मिलती थी। यहां दूध बंद कर दिया गया और सिर्फ सूखी रोटी खाने के लिए सावरकर को दी जाने लगी। सावरकर ने यहां जॉन बन्यन की "द प्रिल्ग्रिम्स प्रॉग्रेस", डब्ल्यू टी स्टीड या रूसी जनरल कुरोप्तकिन की पुस्तकों में से किसी एक की मांग रखी। लेकिन शाम को उन्हें अंग्रेजी बाइबल की एक प्रति दी गई। बाकी मांगों को खारिज कर दिया गया।

बायकुला जेल से उन्हें जल्द ही एक दूसरी जेल ठाणे जेल में स्थानांतरित किया गया। यहां पर किसी भी कैदी को विनायक के पास आने की अनुमति नहीं थी विनायक की निगरानी के लिए दुर्दांत पहरेदार रखें गए जो सब मुस्लिम थे। 

यहां खाने में आधे पके ज्वार और अधपकी सब्जियां मिलती थी, जो कड़वी होती थी। अक्सर रोटी तोड़कर मुंह में डालकर उसे पानी से निगलना पड़ता था। सावरकर की सभी संपत्तियां जप्त कर ली गई उनके संदूक पुस्तक, कपड़े और अन्य साज और सामान सब कुछ जिसकी कुल कीमत 27000 रुपए थी । यहां तक की खाना पकाने के बर्तन भी जप्त कर लिए गए थे। एक सुबह जेल में सावरकर से कहा गया कि वह अपना चश्मा और छोटी सी भागवत गीता की प्रति भी दे दें क्योंकि यह भी उनकी संपत्ति है लेकिन बाद में रहम दिखाते हुए सरकार को 
 गीता और चश्मा लौटा दिया , जिसे अब सरकारी संपत्ति के तौर पर सावरकर को इस्तेमाल करना था।

25 जून 1911 सावरकर की स्वास्थ्य जांच की गई ताकि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में जाना जा सके फिर उन्हें स्वस्थ घोषित करके मद्रास और वहां से अंडमान भेजने की तैयारी की गई।

एक बनियान, उस पर एक पुराना कंबल, हाथ में छोटा प्याला लोहे की तश्तरी, बगल में कंबल और गद्दा दबाए सावरकर को कड़े पहरे के बीच मद्रास जाने वाले वैन में बैठाया गया। इस दौरान सावरकर के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेडी थी।

27 जून 1911 को एस एस महाराजा नामक जहाज से विनायक दामोदर सावरकर की एक खतरनाक अपराधी के तौर पर अंडमान द्वीप के सेल्यूलर जेल की यात्रा शुरू हुयी। इस कष्टदायी पल के बारे में विनायक सावरकर लिखते हैं--

"आजीवन कारावास के लिए अंडमान के लिए रवाना होना किसी जीवित व्यक्ति को उसके ताबूत में लिटाने जैसा है। इस दौरान हजारों अंडमान गए कोई 10 भी भारत वापस लौटकर नहीं आए।.......... बाहरी दुनिया के लिए मैं मृत था, यह भावना उनके चेहरों पर अंकित थी।....... मेरी और देखना, निकट से जाने वाली किसी अर्थी को देखने जैसा ही था। यदि कोई मेरा साथी मुझसे कहता , "जाओ मेरे भाई, जाओ, मैं और मेरे जैसे अन्य भारत को आजाद कराने की तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूर्ण करेंगे" तो मुझे लगता कि मेरी आर्थी मुझे फूलों की सेज जैसी महसूस होती।"

#Savarkar 24 
Reyansh की पोस्ट से साभार" 
#Savarkar #सावरकर

प्रधानसेवक के नाम काफिरानंद की पाती -१

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प्रधानसेवक के नाम काफिरानंद की पाती -१ 
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आदरणीय मोद्यानंद आत्ममुग्धानंद जी महाराज, 
सादर प्रणाम! 
चूंकि आप सेवातीर्थ धाम के प्रधानसेवक हैं तो यही ठीक लगा कि मेटा- प्रदत्त इस इलेक्ट्रॉनिक पोस्टकार्ड द्वारा ही आपसे संवाद किया जाए। वैसे भी अब लुकाने - छिपाने के लिए है ही क्या ! गए माघ उनतीस दिन बाकी। 
मुझे ईश्वर पर विश्वास है कि उनकी कृपा से दिन में कुछ पल के लिए ही सही आप पौंड्रक सिंड्रोम (आत्ममुग्धता) से बाहर आते होंगे। इसी विश्वास के साथ आपसे कहना है कि मैं भाजपा नेतृत्व के कांग्रेसीकरण पर दंग हूँ। आपके लोग यह समझाने लगे हैं कि भाजपा गई तो कांग्रेस आ जाएगी। 

श्रीमन् , अभी तो नेतृत्व की सिर्फ आलोचना हुई है जो आपसे सहन नहीं हो रही। मने कि आप पूरी तरह कांग्रेस - कम्युनिस्ट हो चुके हैं। टू इन वन । इस लिहाज से तो आपकी पार्टी की आलोचना का असली मतलब कांग्रेस के पीछे चट्टान की तरह खड़े यूरोईसाई- कम्युनिस्ट- जिहादी गिरोह की आलोचना हुई न? 
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थोक वोट के लिए उत्पीड़क - पीड़ित की फेक कांग्रेसी नैरेटिव को आप खुद ही अपना चुके हैं। आप SC - ST अधिनियम को न्यायसम्मत बनाने वाले २०१८ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट देते हो, फिर समाज तोड़क यूजीसी दिशानिर्देश लाते हो। उधर मुँह के अतिसार का शिकार संघ नेतृत्व बिना मांगे दो सौ साल के लिए आरक्षण की बात करता है। 

फिर आपमें और कांग्रेस के बीच जैविक परिवारवाद के सिवा क्या अंतर रहा ? अधार्मिकता, पाखण्ड और देशतोड़क बुद्धि में तो आप उनसे भी आगे निकल गए। गुरु गुड़ और चेला चीनी, है न? इसलिए कांग्रेस - वांग्रेस की सत्ता-वापसी वाली बचकानी धमकी से बाज़ आइए। 
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मुद्दे की बात यह है कि अगर नेतृत्व को नहीं बदलना है तो अपनी वामीस्लामी - ईसाई सोच बदलें कि 'किसी के साथ अन्याय करके ही दूसरे के साथ न्याय हो सकता है'! आप अपने नेतृत्व का दिमागी इलाज कराएं। आपमें सेकुलर दास की आत्मा प्रविष्ट कर गई है। किसी धार्मिक तांत्रिक से मिलें, वो बुखार झार देगा। बीमारी आपको है तो आपका वोटर क्यों इलाज करवाए? मने कुछ भी यों ही: 
" जनता को गोली मार दो
  जनता प्रतिक्रियावादी हो गई है।" 
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जनता अपना भला बुरा समझती है इसलिए २०१४ में आडवाणी जी की भाजपा की जगह आपकी भाजपा को ले आई। और इधर आप हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत का चकमा देकर खुद ही कांग्रेसी हो लिए। नई बोतल में पुरानी शराब? 
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जैसे नेहरू और उनकी बेटी के स्वर्ग सिधारने पर यह नैरेटिव बनाया गया कि अब देश में अराजकता आ जाएगी, वैसा ही आप करवा रहे हैं। यह याद दिलाने की जरुरत तो नहीं कि नेहरू - इंदिरा के जाने के बाद देश बेहतर हुआ है, तन और मन दोनों से? आडवाणी जी के मार्गदर्शक मंडल में जाने और आपके आने के बाद भी देश आगे बढ़ा है। बस एक पेंच है: 
'आपका नवजागृत हिंदू वोटर राजधानी एक्सप्रेस पर सवार है लेकिन आपकी राजनीति बार - बार उसका वैकम खोल दे रही है क्योंकि आपके तौर-तरीके लोकल ट्रेन वाले हैं'!  
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इसलिए श्री श्री १००८ श्री मोदीप्रिय जी महाराज! आप दो में से एक काम करिए: या तो खुद को बदलिए या नेतृत्व को। ऐसा नहीं हुआ तो आपके भक्त - वोटर अपना भगवान ही बदलने के लिए कृतसंकल्प हो जायेंगे। वैसे वह भगवान ही कैसा जो अपने भक्तों के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं हो। 

इसका पहला लक्षण होगा कि मोदीभक्त के नाम से प्रख्यात लोग आपके बारे में बोलना ही बंद कर देंगे। दूसरा कि वे ऐसे नेता की तलाश करेंगे जो आपकी तरह कालनेमी न होकर सच्चा धार्मिक हो। जिसका सिर्फ कपड़ा ही नहीं, मन भी धार्मिक हो। 
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इसलिए हे मास्टरस्ट्रोकी आत्ममुग्धानंद स्वामी, धर्म के पीछे हाथ धोकर पड़ने के बजाय धार्मिक बनिए, सत्ता रहे चाहे जाए। अपनी कुर्सी के साथ ही स्वर्गारोहण की कामना को त्याग अपने ही बनाए मार्गदर्शक मंडल का रुख कीजिए। कम से कम सम्मान से आप याद तो किए जाएंगे! 
आपका एक शुभचिंतक, 
काफिरानंद - सह - पूर्व सेकुलरदास 

© चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह